इलेक्ट्रिक तारों से तानपुरा के तारों तक

 

इलेक्ट्रिक तारों से तानपुरा के तारों तक

दफ़्तर की मेज़ पर सजी थी जो सफलता की बुलंद पहचान,
कभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गूंजता था जिसका नाम।
बनाया जिसने मशीनों और बड़ी परियोजनाओं को अपना जहान,
वही सफल इंजीनियर रहा कभी इस महफ़िल की शान।

कलम की रवानी भी थी उसकी बेहद खास और खरी,
हिंदी अधिकारी बन संभाली जब ज़िम्मेदारी बड़ी।
संसदीय समिति के निरीक्षण में अधिकारी बने मार्गदर्शक,
जिनकी प्रशासनिक सूझबूझ और मार्गदर्शन बने पथ प्रदर्शक।

पर नियति के मन में तो कोई और ही धुन बज रही थी,
भीतर कहीं सुरों की एक नई दुनिया सज रही थी।
आज से ठीक एक वर्ष पहले थम गया वो दौड़ता हुआ कारवां,
अचानक रिटायरमेंट ले, उसने बदल दिया अपना आसमां।
छूट गए पीछे वो रुतबे, वो दफ़्तर और वो बड़ी-बड़ी बातें,
अब तानपुरे के तारों संग गुजरती हैं उसकी सुबह और रातें।
लिया है दाखिला अब संगीत की इस पावन पाठशाला में,
खोज रहा है खुद को अब वो सुरों के उजाले में।
सब जानते हैं कि संगीत एक बहुत लंबा और धैर्य का काम है,
यहाँ रातों-रात नहीं मिलता कोई मुकाम है।

तपस्या है यह बड़ी गहरी, साधना की एक अनवरत डगर है,
पर बिना थके, बिना डरे, बस इस राह पर शुरू हुआ सफर है।
बदल चुका है जीवन का ढंग, बदल चुका है अब नज़रिया,
मशीनों से मुड़कर सुरों की तरफ़ बह निकला है यह दरिया।
भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, इसका किसे पता है,
देखते हैं अब जीवन हमें किस नए मोड़ पर ले जाता है।

संजय गुप्ता